Friday, September 11, 2015

Non stop Hansi

If 'muuaah' is a Kiss..:* Then... . . . . . . . . . . . 'Kalmuuaah' is promise to kiss tomorrow...!!

No Claps plzzz...!!☺

I hate publicity....✋.        

I m the best.
I can prove it.

I can put Coffee in coffee cup.Can you put world in World Cup?

OK 1 more ☝

I can send my Address on your Mobile.
Can you send your Mobile on my Address?

Nahi..Ok OK

I can eat Cream Biscuits with Cream.
Can you eat Tiger Biscuit with tiger?
Kaha na only I m the Best...

Ab apne naam se sab ko mat 4ward Karna, Kyoki isse sachai nai badal jayegi.

Dost kaminey hone chaahiye;
Co-operative to Banks bhi hote hai.

Acha ☝aur

Becoz of Global Warming........

Our Next generation will not b able to see Tigers !!!!
.
.
.
.
Toh
Hum kya kare?

Humne bhi to Dinosaur nahi dekha hai.

Kabhi Shikayat ki kya?
ye wala last

Only 940 girls are left for every 1000 boys
in India .........
SAVE GIRLS !!!
..
we can save the tigers later....
.
Bike pe piche ladki chahiye ya tiger ??
.
.
choice is yours....
Janhit Mein Jaari.... bachao Naari..!!

ye wala final

Ghor Kalyug

Teacher: Who was Akbar ? 
Boy: Akbar was Gay.

Teacher:- What, Are you mad ? Why did you say that?

Boy:- We have heard Laila - Majnu , Heer -Ranjha , Soni- Mahival ,Romeo-Juliet 
But Only
Akbar - Birbal !
Teacher diedBilkul Latest ......
Sidha Hospital se  ...........
...................................................................

✋ bus ye wala last

Kareena ko ladka hua, Bilkul kaala.
Saif ne kaha: Tu gori, Main gora ladka kaise kala...?
Kareena Replied :::
Tu Hot , Main Hot ...
Jal Gaya Saala...... I

Wednesday, September 2, 2015

Sanskaar - Mahatav

कहानी - किस्से आपने खूब पढ़े होंगे मगर जो बात मैं आपसे कहने जा रहा हूं वह अगर आपके मर्म को छू जाए तो अपने बच्चों को अवश्य बताएं : -

पढ़ाई पूरी करने के बाद एक छात्र किसी बड़ी कंपनी में नौकरी पाने की चाह में इंटरव्यू देने के लिए पहुंचा....

छात्र ने बड़ी आसानी से पहला इंटरव्यू पास कर लिया...

अब फाइनल इंटरव्यू
कंपनी के डायरेक्टर को लेना था...

और डायरेक्टर को ही तय
करना था कि उस छात्र को नौकरी पर रखा जाए या नहीं...

डायरेक्टर ने छात्र का सीवी (curricular vitae)  देखा और पाया  कि पढ़ाई के साथ- साथ यह  छात्र ईसी (extra curricular activities)  में भी हमेशा अव्वल रहा...

डायरेक्टर- "क्या तुम्हें  पढ़ाई के दौरान
कभी छात्रवृत्ति (scholarship)  मिली...?"

छात्र- "जी नहीं..."

डायरेक्टर- "इसका मतलब स्कूल-कॉलेज  की फीस तुम्हारे पिता अदा करते थे.."

छात्र- "जी हाँ , श्रीमान ।"

डायरेक्टर- "तुम्हारे पिताजी  क्या काम  करते  है?"

छात्र- "जी वो लोगों के कपड़े धोते हैं..."

यह सुनकर कंपनी के डायरेक्टर ने कहा- "ज़रा अपने हाथ तो दिखाना..."

छात्र के हाथ रेशम की तरह मुलायम और नाज़ुक थे...

डायरेक्टर- "क्या तुमने कभी  कपड़े धोने में अपने  पिताजी की मदद की...?"

छात्र- "जी नहीं, मेरे  पिता हमेशा यही चाहते थे
कि मैं पढ़ाई  करूं और ज़्यादा से ज़्यादा किताबें
पढ़ूं...

हां , एक बात और, मेरे पिता बड़ी तेजी  से कपड़े धोते हैं..."

डायरेक्टर- "क्या मैं तुम्हें  एक काम कह सकता हूं...?"

छात्र- "जी, आदेश कीजिए..."

डायरेक्टर- "आज घर वापस जाने के बाद अपने पिताजी के हाथ धोना...
फिर कल सुबह मुझसे आकर मिलना..."

छात्र यह सुनकर प्रसन्न हो गया...
उसे लगा कि अब नौकरी  मिलना तो पक्का है,

तभी तो  डायरेक्टर ने कल फिर बुलाया है...

छात्र ने घर आकर खुशी-खुशी अपने पिता को ये सारी बातें बताईं और अपने हाथ दिखाने को कहा...

पिता को थोड़ी हैरानी हुई...
लेकिन फिर भी उसने बेटे
की इच्छा का मान करते हुए अपने दोनों हाथ उसके
हाथों में दे दिए...

छात्र ने पिता के हाथों को धीरे-धीरे धोना शुरू किया.

साथ ही उसकी आंखों से आंसू भी झर-झर बहने लगे...

पिता के हाथ रेगमाल (emery paper) की तरह सख्त और जगह-जगह से कटे हुए थे...

यहां तक कि जब भी वह  कटे के निशानों पर  पानी डालता, चुभन का अहसास
पिता के चेहरे पर साफ़ झलक जाता था...।

छात्र को ज़िंदगी में पहली बार एहसास हुआ कि ये
वही हाथ हैं जो रोज़ लोगों के कपड़े धो-धोकर उसके
लिए अच्छे खाने, कपड़ों और स्कूल की फीस का इंतज़ाम करते थे...

पिता के हाथ का हर छाला सबूत था उसके एकेडैमिक कैरियर की एक-एक
कामयाबी का...

पिता के हाथ धोने के बाद छात्र को पता ही नहीं चला कि उसने  उस दिन के बचे हुए सारे कपड़े भी एक-एक कर धो डाले...

उसके पिता रोकते ही रह गए , लेकिन छात्र अपनी धुन में कपड़े धोता चला गया...

उस रात बाप- बेटे ने काफ़ी देर तक बातें कीं ...

अगली सुबह छात्र फिर नौकरी  के लिए कंपनी के  डायरेक्टर के ऑफिस में था...

डायरेक्टर का सामना करते हुए छात्र की आंखें गीली थीं...

डायरेक्टर- "हूं , तो फिर कैसा रहा कल घर पर ?
क्या तुम अपना अनुभव मेरे साथ शेयर करना पसंद करोगे....?"

छात्र- " जी हाँ , श्रीमान कल मैंने जिंदगी का एक वास्तविक अनुभव सीखा...

नंबर एक... मैंने सीखा कि सराहना क्या होती है...
मेरे पिता न होते तो मैं पढ़ाई में इतनी आगे नहीं आ सकता था...

नंबर दो... पिता की मदद करने से मुझे पता चला कि किसी काम को करना कितना सख्त और मुश्किल होता है...

नंबर तीन.. . मैंने रिश्तों की अहमियत पहली बार
इतनी शिद्दत के साथ महसूस की..."

डायरेक्टर- "यही सब है जो मैं अपने मैनेजर में देखना चाहता हूं...

मैं यह नौकरी केवल उसे  देना चाहता हूं जो दूसरों की मदद की कद्र करे,
ऐसा व्यक्ति जो काम किए जाने के दौरान दूसरों की तकलीफ भी महसूस करे...

ऐसा शख्स जिसने
सिर्फ पैसे को ही जीवन का ध्येय न बना रखा हो...

मुबारक हो, तुम इस नौकरी  के पूरे हक़दार हो..."

आप अपने बच्चों को बड़ा मकान दें, बढ़िया खाना दें,
बड़ा टीवी, मोबाइल, कंप्यूटर सब कुछ दें...

लेकिन साथ ही  अपने बच्चों को यह अनुभव भी हासिल करने दें कि उन्हें पता चले कि घास काटते हुए कैसा लगता है ?

उन्हें  भी अपने हाथों से ये  काम करने दें...

खाने के बाद कभी बर्तनों को धोने का अनुभव भी अपने साथ घर के सब बच्चों को मिलकर करने दें...

ऐसा इसलिए
नहीं कि आप मेड पर पैसा खर्च नहीं कर सकते,
बल्कि इसलिए कि आप अपने बच्चों से सही प्यार करते हैं...

आप उन्हें समझाते हैं कि पिता कितने भी अमीर
क्यों न हो, एक दिन उनके बाल सफेद होने ही हैं...

सबसे अहम हैं आप के बच्चे किसी काम को करने
की कोशिश की कद्र करना सीखें...

एक दूसरे का हाथ
बंटाते हुए काम करने का जज्ब़ा अपने अंदर
लाएं...

यही है सबसे बड़ी सीख..............

आप सभी  से निवेदन है  कि  उक्त कहानी से सीख लें और अपने परिवार पर इसका प्रयोग कर अपने बच्चों को सर्वोच्च शिक्षा प्रदान करें।

Tuesday, September 1, 2015

Ek Sawal.. jisa koi jawab nahi.. Caste Reservation

स्कूल से एक 6th क्लास का बच्चा अपने घर आ कर अपनी माँ से पूछता है - "माँ ये SC और ST क्या हैं ?"
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माँ: बेटा ये तुम्हे क्यों जानना है ??
.
बच्चा: माँ आज सर हमसे पूछ रहे थे की कौन-कौन SC ST का हैं !!!!!
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माँ: बेटा उन्होंने ऐसा क्यों पूछा, उन्होंने नहीं बताया क्या ??
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बच्चा:- बताया, पर सिर्फ इतना कि जो जो SC ST के हैं उन्हें पैसे मिलेंगे.....!
.
पर माँ ये क्या होता हैं??
.
माँ: बेटा हमारे सविधान में 4 कास्ट बनायीं है SC ST Obc और General
तो सरकार उन्हें गरीब और पिछड़े हुए लोगो को मदद करने के लिए सुविधा दी हैं।
.
बच्चा: पर माँ सिर्फ उन्हें ही क्यों मिलती हैं और मेरा दोस्त तो गरीब भी नहीं हैं फिर
भी उसे मिलेगे पैसे ..ये सुविधा गरीब के लिए हैं तो हम भी गरीब है न तो हमको क्यों नहीं मिलेंगे पैसे??
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माँ: बेटा ये सविधान में लिखा है ।
.
बेटा: पर माँ सविधान के बारे में कहा था की सब को एक जैसा हक़ है तो फिर ये क्यों ??
.
माँ: बेटा ये सब राजनीति का गन्दा खेल हैं उनकी वजह से आज धर्म और जाति के नाम पर लोग एक सामान नही हैं....!
.
बेटा: पर माँ हम क्या हैं जिस से हम को पैसे नहीं मिलेगे ।
.
माँ: बदनसीब।
.
हम लोग बदनसीब है बेटा ।
.
पूरे विश्व में कही पर इस तरह का नियम नहीं है बस हमारे भारत में है ये सुविधा । ...सविधान निर्माता ने इसको सिर्फ 10 वर्ष के लिए रखा था पर ये देश के दलालो ने इसको पूर्ण रूप से लागू कर दिया ।
....अगर इन्हें लागू करना ही है तो राजनीति में भी लागू करना चाहिए मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री भी SC और ST का होना चाहिए तब पता चलेगा उन्हें भी ।
.
बेटा: माँ क्या आगे भी मुझे इसी तरह की दिक्कत होगी ???
.
माँ: हाँ बेटा ।
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आगे तुझे पढ़ाई में,नोकरी में ,प्रमोशन में, हर जगह दिक्कत आएगी ...
.
जातिवाद का जहर तुझे मजबूर कर देगा और तू कितना भी सहन कर ले एक दिन तू जरूर बोलेगा की ये कोटा बंद करो ।
.
बेटा: माँ तो क्या हमारी मदद कोई नहीं करेगा काश में भारत छोड़ कही और पैदा हुआ होता ।
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माँ: ऐसा नहीं बोलते बेटा इस धरती को हमारे पूर्वजो ने खून से सींचा हैं और बलिदान दिया है तुम्हे गर्व होना चाहिए की तुम एक भारतीय हो ।
.
बस ये सत्ता के भूखे लोग हमारी गरीबी दूर करने के बजाये वोट पाने की होड़ में हैं ।
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बेटा: माँ मेरा दोस्त बोलता हैं की पैसे मिलेगे तो पार्टी करेगे. माँ हमें एक रोज
की रोटी बड़ी मुश्किल से मिलती हैं और मेरे दोस्त पार्टी करेगे । माँ में नहीं जाउगा स्कूल कल से ।
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माँ: नहीं बेटा तुम रोज स्कूल जाओ और पढ़ो ....पढ़ लिख कर शायद तुम इस कोटा को बदल दो.....
.
बेटा : हा माँ में खूब पढूंगा पर हमारे पास इतने पैसे नहीं हैं की आगे पढ़ सकूँ...!!!
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माँ: तू चिंता न कर मैं काम करुँगी न तेरी पढ़ाई के लिए |

Real Meaning for Reservation

एक रियल घटना

पान की दुकान पर खडे एक 30 वर्षीय S T कास्ट के युवक से बातचीत के कुछ अंश ...

मैने पूछा कुछ कमाते धमाते क्यो नहीं...?

वह बोला - क्यो.?

मै बोला शादी कर लो ...?

वह बोला हो गई ..

कैसे ..??

वह बोला -मुख्यमंत्री कन्यादान योजना मे...

मे बोला फिर बाल बच्चों के लिये कमाओ...?

वह बोला - जननी सुरक्षा से डिलेवरी फ्री और साथ मे 1400 रू का चेक...

मेने बोला बच्चो कि पढ़ाई लिखाई के लिये कमाओ..?

वह बोला उनके लिये पढ़ाई और भोजन फ्री...
साथ में  लड़का MBBS कर रहा है उसे स्कोलरशिप भी मिलती है उस से हम ऐस करते हे
मैने बोला यार घर कैसे चलाते हो वह बोला-
छोटी लड़की को अभी वसुन्धरा सरकार से स्कूटी मिली है
1रू किलो गेंहू और चावल से...!

मै झुझला कर बोला यार माॅ बाप को तीर्थयात्रा के लिये तो कमा ...??

वह बोला दो धाम करवा दिये है मुख्यमंत्री तीर्थ यात्रा से...!

मुझे गुस्सा आया और मैंने बोला-
माॅ बाप के मरने के बाद जलाने के लिये कमा..?

वह बोला 1 रू मे विद्युत शवदाह गृह है..!

मैंने कहा तेरे बच्चो कि शादी के लिये कमा..?

वह मुस्कुराया और बोला -
फिर वहीं आ गये... वैसे ही होगी जैसे मेरी हुई थी...!!

? यार एक बात बता ये इतने अच्छे कपडे तू कैसे पहनता है ?

वह बोला राज की बात है..फिर भी मै बता देता हूँ...

"सरकारी जमीन पर कब्जा करो आवास योजना मे लोन लो और फिर मकान बेच कर फिर जमीन कब्जा कर पट्टा ले लो...!!"

ज्यादा कोई 3- 5 करे तो सालो को झुटे atrocity(जातिसूचक) केस में अंदर करवा दो, फिर लाख दो लाख समझोता करने के लिए ऑफर आ जायेंगे
ये है असली आरक्षण

दोस्तों इसे सब grp में भेजे सरकार को पता चले की हमारी मेहनत की कमाई कैसे लुटा कर लोगो को मक्कार बना रही हे।
जय हिन्द जय भारत

Pls send to other also

Friday, August 28, 2015

बेटियां

जन्म देने के लिए माँ चाहिये,
राखी बाँधने के लिए बहन चाहिये,
कहानी सुनाने के लिए दादी चाहिये,
जिद पूरी करने के लिए मौसी चाहिए,
खीर खिलाने के लिए मामी चाहये,
साथ निभाने के लिए पत्नी चाहिये,
पर यह सभी रिश्ते निभाने के लिए

बेटियां तो जिन्दा रहनी चाहये

घर आने पर दौड़ कर जो पास आये,
उसे कहते हैं बिटिया ।।

थक जाने पर प्यार से जो माथा सहलाए,
उसे कहते हैं बिटिया ।।

"कल दिला देंगे" कहने पर जो मान जाये,
उसे कहते हैं बिटिया ।।

हर रोज़ समय पर दवा की जो याद दिलाये,
उसे कहते हैं बिटिया ।।

घर को मन से फूल सा जो सजाये, उसे कहते हैं बिटिया ।।

सहते हुए भी अपने दुख जो छुपा जाये,
उसे कहते हैं बिटिया ।।

दूर जाने पर जो बहुत रुलाये,
उसे कहते हैं बिटिया ।।

पति की होकर भी पिता को जो ना भूल पाये,
उसे कहते हैं बिटिया ।।

मीलों दूर होकर भी पास होने का जो एहसास दिलाये,
उसे कहते हैं बिटिया ।।

"अनमोल हीरा" जो कहलाये,
उसे कहते हैं बिटिया ।।

अगर आप भी अपनी बेटी को प्यार करते हैं तो आप इसे अपने दोस्तों को अवश्य शेयर करें .

[ आज बिटिया दिवस की बधाई देश की सभी गौरव शाली बिटिया व उनके भाग्यशाली पापा और मम्मी  को जिन्होंने कम से कम एक बिटिया को दो कुल की रक्षा के लिए जन्म दिया।

Thursday, August 27, 2015

Neki kar Dariya me daal

एक औरत अपने परिवार के सदस्यों के लिए रोज़ाना भोजन पकाती थी और एक रोटी वह वहाँ से गुजरने वाले किसी भी भूखे के लिए पकाती थी..।

वह उस रोटी को खिड़की के सहारे रख दिया करती थी, जिसे कोई भी ले सकता था..।

एक कुबड़ा व्यक्ति रोज़ उस रोटी को ले जाता और बजाय धन्यवाद देने के अपने रस्ते पर चलता हुआ वह कुछ इस तरह बड़बड़ाता- "जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा और जो तुम अच्छा करोगे वह तुम तक लौट के आएगा..।"

दिन गुजरते गए और ये सिलसिला चलता रहा..

वो कुबड़ा रोज रोटी लेके जाता रहा और इन्ही शब्दों को बड़बड़ाता- "जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा और जो तुम अच्छा करोगे वह तुम तक लौट के आएगा.।"

वह औरत उसकी इस हरकत से तंग आ गयी और मन ही मन खुद से कहने लगी की- "कितना अजीब व्यक्ति है, एक शब्द धन्यवाद का तो देता नहीं है, और न जाने क्या-क्या बड़बड़ाता रहता है, मतलब क्या है इसका.।"

एक दिन क्रोधित होकर उसने एक निर्णय लिया और बोली- "मैं इस कुबड़े से निजात पाकर रहूंगी.।"

और उसने क्या किया कि उसने उस रोटी में ज़हर मिला दिया जो वो रोज़ उसके लिए बनाती थी, और जैसे ही उसने रोटी को को खिड़की पर रखने कि कोशिश की, कि अचानक उसके हाथ कांपने लगे और रुक गये और वह बोली- "हे भगवन, मैं ये क्या करने जा रही थी.?" और उसने तुरंत उस रोटी को चूल्हे कि आँच में जला दिया..। एक ताज़ा रोटी बनायीं और खिड़की के सहारे रख दी..।

हर रोज़ कि तरह वह कुबड़ा आया और रोटी ले के: "जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा, और जो तुम अच्छा करोगे वह तुम तक लौट के आएगा" बड़बड़ाता हुआ चला गया..।

इस बात से बिलकुल बेख़बर कि उस महिला के दिमाग में क्या चल रहा है..।

हर रोज़ जब वह महिला खिड़की पर रोटी रखती थी तो वह भगवान से अपने पुत्र कि सलामती और अच्छी सेहत और घर वापसी के लिए प्रार्थना करती थी, जो कि अपने सुन्दर भविष्य के निर्माण के लिए कहीं बाहर गया हुआ था..। महीनों से उसकी कोई ख़बर नहीं थी..।

ठीक उसी शाम को उसके दरवाज़े पर एक दस्तक होती है.. वह दरवाजा खोलती है और भोंचक्की रह जाती है.. अपने बेटे को अपने सामने खड़ा देखती है..।

वह पतला और दुबला हो गया था.. उसके कपडे फटे हुए थे और वह भूखा भी था, भूख से वह कमज़ोर हो गया था..।

जैसे ही उसने अपनी माँ को देखा, उसने कहा- "माँ, यह एक चमत्कार है कि मैं यहाँ हूँ.. आज जब मैं घर से एक मील दूर था, मैं इतना भूखा था कि मैं गिर गया.. मैं मर गया होता..।

लेकिन तभी एक कुबड़ा वहां से गुज़र रहा था.. उसकी नज़र मुझ पर पड़ी और उसने मुझे अपनी गोद में उठा लिया.. भूख के मरे मेरे प्राण निकल रहे थे.. मैंने उससे खाने को कुछ माँगा.. उसने नि:संकोच अपनी रोटी मुझे यह कह कर दे दी कि- "मैं हर रोज़ यही खाता हूँ, लेकिन आज मुझसे ज़्यादा जरुरत इसकी तुम्हें है.. सो ये लो और अपनी भूख को तृप्त करो.।"

जैसे ही माँ ने उसकी बात सुनी, माँ का चेहरा पीला पड़ गया और अपने आप को सँभालने के लिए उसने दरवाज़े का सहारा लीया..।

उसके मस्तिष्क में वह बात घुमने लगी कि कैसे उसने सुबह रोटी में जहर मिलाया था, अगर उसने वह रोटी आग में जला के नष्ट नहीं की होती तो उसका बेटा उस रोटी को खा लेता और अंजाम होता उसकी मौत..?

और इसके बाद उसे उन शब्दों का मतलब बिलकुल स्पष्ट हो चूका था- "जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा, और जो तुम अच्छा करोगे वह तुम तक लौट के आएगा.।।

          ��" निष्कर्ष "��
           ==========
हमेशा अच्छा करो और अच्छा करने से अपने आप को कभी मत रोको, फिर चाहे उसके लिए उस समय आपकी सराहना या प्रशंसा हो या ना हो..।
            ==========

अगर आपको ये कहानी पसंद आई हो तो इसे दूसरों के साथ ज़रूर शेयर करें..

मैं आपसे दावे के साथ कह सकता हूँ कि ये बहुत से लोगों के जीवन को छुएगी व बदलेगी.।

Wednesday, August 26, 2015

आत्मा अर्पण

बहूत ही सुंदर ( कृपया एक-एक शब्द पढें )

कोई सोना चढाए , कोई चाँदी चढाए ;
कोई हीरा चढाए , कोई मोती चढाए ;

चढाऊँ क्या तुझे भगवन ; कि ये निर्धन का डेरा है ;

अगर मैं फूल चढाता हूँ , तो वो भँवरे का झूठा है ;
अगर मैं फल चढाता हूँ , तो वो पक्षी का झूठा है ;
अगर मैं जल चढाता हूँ , तो वो मछली का झूठा है ;
अगर मैं दूध चढाता हूँ , तो वो बछडे का झूठा है ;

चढाऊँ क्या तुझे भगवन ; कि ये निर्धन का डेरा है ;

अगर मैं सोना चढ़ाता हूँ , तो वो माटी का झूठा है ;
अगर मैं हीरा चढ़ाता हूँ , तो वो कोयले का झूठा है ;
अगर मैं मोती चढाता हूँ , तो वो सीपो का झूठा है ;
अगर मैं चंदन चढाता हूँ , तो वो सर्पो का झूठा है ;

चढाऊँ क्या तुझे भगवन, कि ये निर्धन का डेरा है ;

अगर मैं तन चढाता हूँ , तो वो पत्नी का झूठा है ;
अगर मैं मन चढाता हूँ , तो वो ममता का झूठा है ;
अगर मैं धन चढाता हूँ , तो वो पापो का झूठा है ;
अगर मैं धर्म चढाता हूँ , तो वो कर्मों का झूठा है ;

चढाऊँ क्या तुझे भगवन , कि ये निर्धन का डेरा है ;

तुझे परमात्मा जानू , तू ही तो है - मेरा दर्पण ;
तुझे मैं आत्मा जानू , करूँ मैं आत्मा अर्पण.

Monday, August 24, 2015

Jeevan ka Sach ★☆

पढोगे तो रो पड़ोगे...
अपने लिए भी जियें.! थोड़ा सा वक्त निकालो वरना..

ज़िंदगी के 20 वर्ष हवा की तरह उड़ जाते हैं.! फिर शुरू होती है नौकरी की खोज.!
ये नहीं वो, दूर नहीं पास.
ऐसा करते 2-3 नौकरीयां छोड़ते पकड़ते,
अंत में एक तय होती है, और ज़िंदगी में थोड़ी स्थिरता की शुरूआत होती है. !

और हाथ में आता है पहली तनख्वाह का चेक, वह बैंक में जमा होता है और शुरू होता है... अकाउंट में जमा होने वाले कुछ शून्यों का अंतहीन खेल..!

इस तरह 2-3 वर्ष निकल जाते हैँ.!
'वो' स्थिर होता है.
बैंक में कुछ और शून्य जमा हो जाते हैं.
इतने में अपनी उम्र के पच्चीस वर्ष हो जाते हैं.!

विवाह की चर्चा शुरू हो जाती है. एक खुद की या माता पिता की पसंद की लड़की से यथा समय विवाह होता है और ज़िंदगी की राम कहानी शुरू हो जाती है.!

शादी के पहले 2-3 साल नर्म, गुलाबी, रसीले और सपनीले गुज़रते हैं.!
हाथों में हाथ डालकर बातें और रंग बिरंगे सपने.!
पर ये दिन जल्दी ही उड़ जाते हैं और इसी समय शायद बैंक में कुछ शून्य कम होते हैं.!
क्योंकि थोड़ी मौजमस्ती, घूमना फिरना, खरीदी होती है.!

और फिर धीरे से बच्चे के आने की आहट होती है और वर्ष भर में पालना झूलने लगता है.!

सारा ध्यान अब बच्चे पर केंद्रित हो जाता है.! उसका खाना पीना , उठना बैठना, शु-शु, पाॅटी, उसके खिलौने, कपड़े और उसका लाड़ दुलार.!
समय कैसे फटाफट निकल जाता है, पता ही नहीं चलता.!

इन सब में कब इसका हाथ उसके हाथ से निकल गया, बातें करना, घूमना फिरना कब बंद हो गया, दोनों को ही पता नहीं चला..?

इसी तरह उसकी सुबह होती गयी और बच्चा बड़ा होता गया...
वो बच्चे में व्यस्त होती गई और ये अपने काम में.!
घर की किस्त, गाड़ी की किस्त और बच्चे की ज़िम्मेदारी, उसकी शिक्षा और भविष्य की सुविधा और साथ ही बैंक में शून्य  बढ़ाने का टेंशन.!
उसने पूरी तरह से अपने आपको काम में झोंक दिया.!
बच्चे का स्कूल में एॅडमिशन हुआ और वह बड़ा होने लगा.!
उसका पूरा समय बच्चे के साथ बीतने लगा.!

इतने में वो पैंतीस का हो गया.!
खूद का घर, गाड़ी और बैंक में कई सारे शून्य.!
फिर भी कुछ कमी है..?
पर वो क्या है समझ में नहीं आता..!
इस तरह उसकी चिड़-चिड़ बढ़ती जाती है और ये भी उदासीन रहने लगता है।

दिन पर दिन बीतते गए, बच्चा बड़ा होता गया और उसका खुद का एक संसार तैयार हो गया.! उसकी दसवीं आई और चली गयी.!
तब तक दोनों ही चालीस के हो गए.!
बैंक में शून्य बढ़ता ही जा रहा है.!

एक नितांत एकांत क्षण में उसे वो गुज़रे दिन याद आते हैं और वो मौका देखकर उससे कहता है,
"अरे ज़रा यहां आओ,
पास बैठो.!"
चलो फिर एक बार हाथों में हाथ ले कर बातें करें, कहीं घूम के आएं...! उसने अजीब नज़रों से उसको देखा और कहती है,
"तुम्हें कभी भी कुछ भी सूझता है. मुझे ढेर सा काम पड़ा है और तुम्हें बातों की सूझ रही है..!" कमर में पल्लू खोंस कर वो निकल जाती है.!

और फिर आता है पैंतालीसवां साल,
आंखों पर चश्मा लग गया,
बाल अपना काला रंग छोड़ने लगे,
दिमाग में कुछ उलझनें शुरू हो जाती हैं,
बेटा अब काॅलेज में है,
बैंक में शून्य बढ़ रहे हैं, उसने अपना नाम कीर्तन मंडली में डाल दिया और...

बेटे का कालेज खत्म हो गया,
अपने पैरों पर खड़ा हो गया.!
अब उसके पर फूट गये और वो एक दिन परदेस उड़ गया...!!!

अब उसके बालों का काला रंग और कभी कभी दिमाग भी साथ छोड़ने लगा...!
उसे भी चश्मा लग गया.!
अब वो उसे उम्र दराज़ लगने लगी क्योंकि वो खुद भी बूढ़ा  हो रहा था..!

पचपन के बाद साठ की ओर बढ़ना शुरू हो गया.!
बैंक में अब कितने शून्य हो गए,
उसे कुछ खबर नहीं है. बाहर आने जाने के कार्यक्रम अपने आप बंद होने लगे..!

गोली-दवाइयों का दिन और समय निश्चित होने लगा.!
डाॅक्टरों की तारीखें भी तय होने लगीं.!
बच्चे बड़े होंगे....
ये सोचकर लिया गया घर भी अब बोझ लगने लगा.
बच्चे कब वापस आएंगे,
अब बस यही हाथ रह गया था.!

और फिर वो एक दिन आता है.!
वो सोफे पर लेटा ठंडी हवा का आनंद ले रहा था.!
वो शाम की दिया-बाती कर रही थी.!
वो देख रही थी कि वो सोफे पर लेटा है.!
इतने में फोन की घंटी बजी,
उसने लपक के फोन उठाया,
उस तरफ बेटा था.!
बेटा अपनी शादी की जानकारी देता है और बताता है कि अब वह परदेस में ही रहेगा..!
उसने बेटे से बैंक के शून्य के बारे में क्या करना यह पूछा..?
अब चूंकि विदेश के शून्य की तुलना में उसके शून्य बेटे के लिये शून्य हैं इसलिए उसने पिता को सलाह दी..!"
एक काम करिये, इन पैसों का ट्रस्ट बनाकर वृद्धाश्रम को दे दीजिए और खुद भी वहीं रहिये.!"
कुछ औपचारिक बातें करके बेटे ने फोन रख दिया..!

वो पुनः सोफे पर आ कर बैठ गया. उसकी भी दिया बाती खत्म होने आई थी.
उसने उसे आवाज़ दी,
"चलो आज फिर हाथों में हाथ ले के बातें करें.!"
वो तुरंत बोली,
"बस अभी आई.!"
उसे विश्वास नहीं हुआ,
चेहरा खुशी से चमक उठा,
आंखें भर आईं,
उसकी आंखों से गिरने लगे और गाल भीग गए,
अचानक आंखों की चमक फीकी हो गई और वो निस्तेज हो गया..!!

उसने शेष पूजा की और उसके पास आ कर बैठ गई, कहा,
"बोलो क्या बोल रहे थे.?"
पर उसने कुछ नहीं कहा.!
उसने उसके शरीर को छू कर देखा, शरीर बिल्कुल ठंडा पड़ गया था और वो एकटक उसे देख रहा था..!

क्षण भर को वो शून्य हो गई,
"क्या करूं" उसे समझ में नहीं आया..!
लेकिन एक-दो मिनट में ही वो चैतन्य हो गई,  धीरे से उठी और पूजाघर में गई.!
एक अगरबत्ती जलाई और ईश्वर को प्रणाम किया और फिर से सोफे पे आकर बैठ गई..!

उसका ठंडा हाथ हाथों में लिया और बोली,
"चलो कहां घूमने जाना है और क्या बातें करनी हैं तम्हे.!"
बोलो...!! ऐसा कहते हुए उसकी आँखें भर आईं..!
वो एकटक उसे देखती रही,
आंखों से अश्रुधारा बह निकली.!
उसका सिर उसके कंधों पर गिर गया.!
ठंडी हवा का धीमा झोंका अभी भी चल रहा था....!!

यही जिंदगी है...??
नहीं....!!!

संसाधनों का अधिक संचय न करें,
ज्यादा चिंता न करें,
सब अपना अपना नसीब ले कर आते हैं.!
अपने लिए भी जियो, वक्त निकालो..!

सुव्यवस्थित जीवन की कामना...!!
जीवन आपका है, जीना आपने ही है...!!  

Yahi  hai JEEVAN ka CHAKKAR, sab ko samajhana chahiye  JEEVAN KA SACH...

जिन्दगी एक रात है, जिस में ना जाने कितने ख्वाब हैं, जो मिल गया वो अपना है, जो टुट गया वो सपना है, ये मत सोचो की जिन्दगी में कितने पल है, ये सोचो की हर पल में कितनी जिन्दगी है, इसलिए… जिन्दगी को जी भर कर जी लो…