“ग़ज़ल दो प्याज़ा”
हमने सूंघी है कहीं प्याज़ की महकती खुशबू
हाथ से छू लो इन्हें पर लेने का नाम न लो
सिर्फ एहसास रखो औ रूह से महसूस करो
प्याज़ का प्यार ही रहने दो कोई दाम न दो
प्याज़ का मोल नहीं प्याज़ कोई प्यार नहीं
एक झटका सा है जो धीरे से लगा करता है
न ये रुकता है न झुकता न घटता है कभी
इसका दाम जो है वो दिन रात बढ़ा करता है
सिर्फ एहसास रखो औ रूह से महसूस करो
प्याज़ का प्यार ही रहने दो कोई दाम न दो
मुस्कराहट खिलती है दुकानदार के मुह पर
खरीदार की जेबें तो दिन रात लुटा करती हैं
होंठ कुछ कहते नहीं.कांपते होठों पर मगर
किस्सा ए प्याज़ ही इक बात हुआ करती है
सिर्फ एहसास रखो औ रूह से महसूस करो
प्याज़ का प्यार ही रहने दो कोई दाम न दो
सर्वाधिकार सुरक्षित
गुरदीप सिंह कोहली (अंजुम कानपुरी)
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